Monday, November 9, 2009

तब मैं सिर्फ़ दृष्टा हो जाता हूँ

जब मेरे सारे प्रयास विफल हों जाते हैं
जब मेरी सृजनशक्ति थक जाती है,
जब मैं मूर्छित होकर शैया पर होता हूँ,
जब मुझे सिर्फ़ जिंदा होने का आभास मात्र रहता है,
तब मैं सिर्फ़ दृष्टा हो जाता हूँ...

जब दुनिया के दोहरे मापदंड मुझे प्रलोभन देते हैं ,
मुझ पर करके वार वे नाहक ही डरते हैं ,
अपनी झूठी शान दिखाते जब वे थक जाते हैं,
झूठ प्रबंधन के सारे अस्त्र लक्ष्य से विचलित जब हो जाते हैं ,
तब मैं सिर्फ़ दृष्टा हो जाता हूँ ...

परमेश्वर का सृष्टा स्वरुप जब मेरे जीव रूप से प्रथक हो जाता है ,
और अजब दुनिया का ग़ज़ब तमाशा
रह रह कर विस्मित करता है ,
किसी की प्रतिक्रिया का मन पर कोई भान नहीं जब रहता है ,
तब मैं सिर्फ़ दृष्टा हो जाता हूँ ...

जब दर्द का कोई भी मापदंड या परिभाषा व्यर्थ लगती है ,
जब आत्मा शरीर से निकल निकल राहत लेती है ,
जब हार मुझे अपनी नियत भर लगती है ,
जब दुनिया में अपनी परछाई भी खो जाती है ,
तब मैं सिर्फ़ दृष्टा हो जाता हूँ ...

क्षमा,
सुधीर