बन्धनों में बांधना चाहती दुनिया मुझको
मैं भी बंधना चाहता हूँ ....
किंतु अफ़सोस है कि वो बंधन ढीले हैं
ख्वाबों से हकीक़त की दुनिया में लाना चाहती मुझे दुनिया
पर मुझे तो ये दुनिया ही रहस्यमयी लगती है
मैं जब इसमें आया था मुझे कोई दुःख नही, दर्द नही था
दर्द का आभास भी नही था
मुझे इस दुनिया में कुछ चेहरे मिले
उनमें प्रीति प्रतीत हुई
वो प्रीति शर्करा कालान्तर में विष में तब्दील हुई
और वो विष दुनिया का पर्याय हो गया
मेरी अजीब बातों पर कदाचित,
तुम हैरान मत होना ...
मैं तो हवा का झोंका हूँ
आज आ गया हूँ ... चला भी जाऊँगा
संसार भी एक समंदर है
हर तरह की वस्तुएं यहाँ विद्यमान हैं
कुछ फेरे इस बुलबुले के लगाकर
ये बुलबुला (मैं) भी शांत हो जाएगा ....
क्षमा,
सुधीर
Sunday, September 13, 2009
Tuesday, September 8, 2009
तन्हाई: १=१, १*१=१, १/१=१, १!=१
तनहा ज़िन्दगी की आरजू है यही
कि ये तनहा ही रहे...
एक बराबर एक
एक गुना एक बराबर एक
एक भाजित एक बराबर एक
एक क्रम गुणित एक
एक और एक दो , एक और एक ग्यारह
एक सपना ही था,
वस्तुत: वो कभी शून्य तो कभी एक के आसपास था
साया भी साथ जब छोड़ गया
वो धूप भी अजीब थी
सपनो का आसिया सपना ही था
रेगिस्तान ही अपनी नियति थी ..
क्षमा,
सुधीर
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