Sunday, September 13, 2009

हर बात पे कहते हो कि तू क्या है ...

बन्धनों में बांधना चाहती दुनिया मुझको
मैं भी बंधना चाहता हूँ ....
किंतु अफ़सोस है कि वो बंधन ढीले हैं

ख्वाबों से हकीक़त की दुनिया में लाना चाहती मुझे दुनिया
पर मुझे तो ये दुनिया ही रहस्यमयी लगती है
मैं जब इसमें आया था मुझे कोई दुःख नही, दर्द नही था
दर्द का आभास भी नही था

मुझे इस दुनिया में कुछ चेहरे मिले
उनमें प्रीति प्रतीत हुई
वो प्रीति शर्करा कालान्तर में विष में तब्दील हुई
और वो विष दुनिया का पर्याय हो गया

मेरी अजीब बातों पर कदाचित,
तुम हैरान मत होना ...
मैं तो हवा का झोंका हूँ
आज आ गया हूँ ... चला भी जाऊँगा

संसार भी एक समंदर है
हर तरह की वस्तुएं यहाँ विद्यमान हैं
कुछ फेरे इस बुलबुले के लगाकर
ये बुलबुला (मैं) भी शांत हो जाएगा ....

क्षमा,
सुधीर

2 comments:

  1. वाह ! बहूत अच्छा । एक निवेदन:

    कृप्या वर्ड वेरीफीकेशन हटा लें ताकि टिप्पणी देने में सहूलियत हो. मात्र एक निवेदन है बाकि आपकी इच्छा.

    वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:

    डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?> इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये!!.

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  2. ब्लोगिंग जगत में आपका स्वागत है. आपको पढ़कर बहुत अच्छा लगा. सार्थक लेखन हेतु शुभकामनाएं. जारी रहें.


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    Till 25-09-09 लेखक / लेखिका के रूप में ज्वाइन [उल्टा तीर] - होने वाली एक क्रान्ति!

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