ज़िन्दगी अक्सर जगाती है यूं ही,
या कमबख्त नींद नहीं आती है यूं ही...
किसी की याद आती है यूं ही,
या ज़ख्मों में खारिश है यूं ही...
या कमबख्त नींद नहीं आती है यूं ही...
किसी की याद आती है यूं ही,
या ज़ख्मों में खारिश है यूं ही...
लोक वियोग एक ऐसे सामाजिक मुद्दे को प्रस्तुत करता है कि जो मनुष्य के अन्दर की संसार के प्रति वैराग्य की अनुभूतियों को उजागर करता है। इन अनुभूतियों में बहुत सारी कष्टप्रद हैं । मैंने जी जान लगा कर भी प्रायः हार का स्वाद चखा । जीवन की संसाररूपी प्रयोगशाला में हर रोज़ कुछ अजीब से प्रेक्षण करता रहता हूँ। विधाता है कि नही पता नही... अगर है तो बस एक ही प्रश्न है कि मेरी गति क्या होगी और नियति क्या होगी ....
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