Wednesday, August 4, 2010

ये तेरा जिक्र है

ये तेरा जो जिक्र है...

जिक्र है जो जुबां से जुदा नहीं,
हर लम्हा कि जैसे तेरी अमानत है।
आरजू थी कुछ...
गुज़ारिश शायद ...
कुछ अपूर्ण ख्वाहिश ...
कुछ ख्वाब शायद ...
ज़िन्दगी में कुछ महक है तेरे कहीं होने की ....
ये तेरा जिक्र है
जो मेरे जीने की वजह है शायद ...
क्षमा,
सुधीर

1 comment:

  1. ye poem jiske liy bhi likhi gyee hogi wo realy bahut kushnseeb hoga/hogi...sidhe sarl sbdon main khoobsurt likha hai

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