हर सुबह मेरे कदम ठिठकते हैं,
अनमने ढंग से अजीब अंदाज़ में
क्या होगी आज शाम
शायद हाँ, शायद नहीं
मेरे पास भी बहुत सारा काम है,
जिससे मुझे बहुत सारे पैसे मिलते हैं
तारीफ़ मिलती हैं
थकावट भी मिलती है
फुर्सत भी नही मिलती
मैं खुश हूँ ?
शायद हाँ शायद नही
मैं दुखी हूँ ?
शायद हाँ शायद नही
आज मेरे पास शायद पाने को कुछ नही
जिसे चाहा उसे न पा सका
आज मेरे पास शायद खोने को कुछ नही
मैं मेरे सपनो को खो चुका हूँ
डर नहीं कि शाम हो या न हो,
जब कोई मंजिल ही नहीं
वो पिछली रात के भयावह सपनो का सफर
कर देता है हर सुबह को मेरी शाम ....
क्षमा,
सुधीर
Wednesday, August 19, 2009
Sunday, August 9, 2009
हार
दिल के जख्मो दरार, इनसे ही करना होगा प्यार!
कितने नए सिरे, कितनी शुरुआतें
हर बार नए झटके , भाग्य और संयोग !!
हर बार हार के बाद स्वयं को तलाशता रहा !
दूर बादलों में एक अजीज खोजता रहा
जिंदा रहने के लिए जिंदगी से लड़ता रहा !!
जिनके कंधे सदा थे मेरे लिए जो कदम कदम साथ थे !
विधाता को वो भी पसंद नही आया
उसने उन्हें भी अपने पास बुला डाला !!
हर बार एक ही सवाल होता है,
आख़िर जिंदा क्यों हूँ?
हर बार एक ही ज़बाव होता है,
शायद जिन्दगी अभी और भी बदतर होगी !!
क्षमा,
सुधीर
कितने नए सिरे, कितनी शुरुआतें
हर बार नए झटके , भाग्य और संयोग !!
हर बार हार के बाद स्वयं को तलाशता रहा !
दूर बादलों में एक अजीज खोजता रहा
जिंदा रहने के लिए जिंदगी से लड़ता रहा !!
जिनके कंधे सदा थे मेरे लिए जो कदम कदम साथ थे !
विधाता को वो भी पसंद नही आया
उसने उन्हें भी अपने पास बुला डाला !!
हर बार एक ही सवाल होता है,
आख़िर जिंदा क्यों हूँ?
हर बार एक ही ज़बाव होता है,
शायद जिन्दगी अभी और भी बदतर होगी !!
क्षमा,
सुधीर
लोक वियोग: एक परिचय
लोक वियोग एक ऐसे सामाजिक मुद्दे को प्रस्तुत करता है कि जो मनुष्य के अन्दर की संसार के प्रति वैराग्य की अनुभूतियों को उजागर करता है।
इन अनुभूतियों में बहुत सारी कष्टप्रद हैं ।
मैंने जी जान लगा कर भी प्रायः हार का स्वाद चखा । मेरी हार केवल संबंधो को लेकर ही रही। शिक्षा और व्यवसाय में मैं ठीक रहा क्योंकि उसमें मैं स्वयं ही उत्तरदायी था किंतु जीवन की नौका में जहाँ मुझे एक साथी की तलाश थी उसमें मैं सिर्फ़ उत्तरदायी नही था।
गलतियाँ मैंने जरूर की किंतु इतनी भी नही कि कोई मेरे वर्षो की मित्रता को एक ही झटके में ठोकर मार दे।
जीवन की संसाररूपी प्रयोगशाला में हर रोज़ कुछ अजीब से प्रेक्षण करता रहता हूँ।
विधाता है कि नही पता नही... अगर है तो बस एक ही प्रश्न है कि मेरी गति क्या होगी और नियति क्या होगी ?
मुझे इस लोक में कोई रूचि नही दिखती। मैं यहाँ सिर्फ़ दुःख ही व्यक्त कर सकूंगा।
क्षमा,
सुधीर
इन अनुभूतियों में बहुत सारी कष्टप्रद हैं ।
मैंने जी जान लगा कर भी प्रायः हार का स्वाद चखा । मेरी हार केवल संबंधो को लेकर ही रही। शिक्षा और व्यवसाय में मैं ठीक रहा क्योंकि उसमें मैं स्वयं ही उत्तरदायी था किंतु जीवन की नौका में जहाँ मुझे एक साथी की तलाश थी उसमें मैं सिर्फ़ उत्तरदायी नही था।
गलतियाँ मैंने जरूर की किंतु इतनी भी नही कि कोई मेरे वर्षो की मित्रता को एक ही झटके में ठोकर मार दे।
जीवन की संसाररूपी प्रयोगशाला में हर रोज़ कुछ अजीब से प्रेक्षण करता रहता हूँ।
विधाता है कि नही पता नही... अगर है तो बस एक ही प्रश्न है कि मेरी गति क्या होगी और नियति क्या होगी ?
मुझे इस लोक में कोई रूचि नही दिखती। मैं यहाँ सिर्फ़ दुःख ही व्यक्त कर सकूंगा।
क्षमा,
सुधीर
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