Sunday, August 9, 2009

लोक वियोग: एक परिचय

लोक वियोग एक ऐसे सामाजिक मुद्दे को प्रस्तुत करता है कि जो मनुष्य के अन्दर की संसार के प्रति वैराग्य की अनुभूतियों को उजागर करता है।

इन अनुभूतियों में बहुत सारी कष्टप्रद हैं ।
मैंने जी जान लगा कर भी प्रायः हार का स्वाद चखा । मेरी हार केवल संबंधो को लेकर ही रही। शिक्षा और व्यवसाय में मैं ठीक रहा क्योंकि उसमें मैं स्वयं ही उत्तरदायी था किंतु जीवन की नौका में जहाँ मुझे एक साथी की तलाश थी उसमें मैं सिर्फ़ उत्तरदायी नही था।

गलतियाँ मैंने जरूर की किंतु इतनी भी नही कि कोई मेरे वर्षो की मित्रता को एक ही झटके में ठोकर मार दे।
जीवन की संसाररूपी प्रयोगशाला में हर रोज़ कुछ अजीब से प्रेक्षण करता रहता हूँ।
विधाता है कि नही पता नही... अगर है तो बस एक ही प्रश्न है कि मेरी गति क्या होगी और नियति क्या होगी ?

मुझे इस लोक में कोई रूचि नही दिखती। मैं यहाँ सिर्फ़ दुःख ही व्यक्त कर सकूंगा।
क्षमा,
सुधीर

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