Wednesday, August 19, 2009

हर सुबह मेरी शाम

हर सुबह मेरे कदम ठिठकते हैं,
अनमने ढंग से अजीब अंदाज़ में
क्या होगी आज शाम
शायद हाँ, शायद नहीं

मेरे पास भी बहुत सारा काम है,
जिससे मुझे बहुत सारे पैसे मिलते हैं
तारीफ़ मिलती हैं
थकावट भी मिलती है
फुर्सत भी नही मिलती

मैं खुश हूँ ?
शायद हाँ शायद नही
मैं दुखी हूँ ?
शायद हाँ शायद नही

आज मेरे पास शायद पाने को कुछ नही
जिसे चाहा उसे न पा सका
आज मेरे पास शायद खोने को कुछ नही
मैं मेरे सपनो को खो चुका हूँ

डर नहीं कि शाम हो या न हो,
जब कोई मंजिल ही नहीं
वो पिछली रात के भयावह सपनो का सफर
कर देता है हर सुबह को मेरी शाम ....

क्षमा,
सुधीर



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