Sunday, August 9, 2009

हार

दिल के जख्मो दरार, इनसे ही करना होगा प्यार!
कितने नए सिरे, कितनी शुरुआतें
हर बार नए झटके , भाग्य और संयोग !!

हर बार हार के बाद स्वयं को तलाशता रहा !
दूर बादलों में एक अजीज खोजता रहा
जिंदा रहने के लिए जिंदगी से लड़ता रहा !!

जिनके कंधे सदा थे मेरे लिए जो कदम कदम साथ थे !
विधाता को वो भी पसंद नही आया
उसने उन्हें भी अपने पास बुला डाला !!

हर बार एक ही सवाल होता है,
आख़िर जिंदा क्यों हूँ?
हर बार एक ही ज़बाव होता है,
शायद जिन्दगी अभी और भी बदतर होगी !!

क्षमा,
सुधीर

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